like a dead corpse hung from wall,
after the sentence.
no poems to defend, no stories to tell,
no anecdotes to share.
waiting, for someone to give her a name,
someone who would speak, her.
She, is always there.
इस यतीम रात को मैं कौन सा एक नाम दूँ,
क्या राख़ में लपेट कर,
इस पाक, कोरे चाँद को,
रख दूँ तेरी याद की, गिरह में कहीं.
या सुर्ख इस लहु से मैं ,
इस ख्वाब के इश्तिहार पर,
चंद लफ्ज़ तेरी गुफ्तगू के, मुज्तरिब, उकेरून कोई.
या बर्फाब तेरी आवाज़ को,
इस दिल के सहराओं में,
हर कुतबे पर कर सजदा मैं, खामोशियाँ ढूंढूं कहीं.
या लम्स कोई तेरी याद का,
क़दीम वक़्त की गिरफ्त से,
हयात कर रुखसारों पर, मैं रोशन तुझे करूँ यहीं…
तुझे नाम मैं न दूं कोई…
खला मुक़द्दस है, और ख्वाब पाक़ सलीब मेरे मौला,
ये तजस्सुम भी क्या क़यामत के रोज़ तक्मील होगी…
वक़्त से कैसी शिकायत, कैसा शिक्वा मेरे मौला,
दर्द रवायत है, आह, इल्म में तब्दील होगी…
सर झुकाया है जरूर, घुटने टेके नहीं मौला,
मेरे किरदार का इम्तेहां क्या सिर्फ अन्जील होगी...
इस दामन के ये दाग भी हैं पाक मेरे मौला,
गुनाहों की फैरिस्त में सवाल, और जुस्तजू ज़लील होगी…
तू वाकिफ़ न हो मेरी रूह से ये मुमकिन नहीं मौला,
नशेमन की तलाश में बशारत शायद तहलील होगी…
मुम्किन है कुछ सब्र होगा मुझमें तेरा ‘मौला’
कुछ आतिश “मिराज” की तुझमें भी तख्मील होगी.
Sun-kissed nights, run wild and sure mornings, shrouded in grey walk slow, noons burn high, and so do the hearts. like dawns I linger, lik...