Thursday, August 04, 2011

एक गुफ़्तगू

खला मुक़द्दस है, और ख्वाब पाक़ सलीब मेरे मौला,

ये तजस्सुम भी क्या क़यामत के रोज़ तक्मील होगी…

वक़्त से कैसी शिकायत, कैसा शिक्वा मेरे मौला,

दर्द रवायत है, आह, इल्म में तब्दील होगी…

सर झुकाया है जरूर, घुटने टेके नहीं मौला,

मेरे किरदार का इम्तेहां क्या सिर्फ अन्जील होगी...

इस दामन के ये दाग भी हैं पाक मेरे मौला,

गुनाहों की फैरिस्त में सवाल, और जुस्तजू ज़लील होगी…

तू वाकिफ़ न हो मेरी रूह से ये मुमकिन नहीं मौला,

नशेमन की तलाश में बशारत शायद तहलील होगी…

मुम्किन है कुछ सब्र होगा मुझमें तेरा ‘मौला’

कुछ आतिश “मिराज” की तुझमें भी तख्मील होगी.

एक गुफ्तगू ...

खला मुक़द्दस है, और ख्वाब पाक़ सलीब मेरे मौला,

ये तजस्सुम भी क्या क़यामत के रोज़ तकमील होगी…

वक़्त से कैसी शिकायत, कैसा शिक्वा मेरे मौला,

दर्द रवायत है, आह, इल्म में तब्दील होगी…

सर झुकाया है जरूर, घुटने टेके नहीं मौला,

मेरे किरदार का इम्तेहाँ क्या सिर्फ अन्जील होगी...

इस दामन के ये दाग भी हैं पाक़ मेरे मौला,

गुनाहों की फैरिस्त में सवाल, और जुस्तजू ज़लील होगी…

तू वाकिफ़ न हो मेरी रूह से ये मुमकिन नहीं मौला,

नशेमन की तलाश में बशारत शायद तहलील होगी…

मुमकिन है कुछ सब्र होगा मुझमे तेरा ‘मौला’,

कुछ आतिश “मिराज” की तुझमे भी तख्मील होगी.

Tuesday, June 21, 2011

बहाने...

यूँ तो हमें मुस्कुराने के बहाने मिल ही जाते हैं,

इस शहर को भी चाहने के कुछ माने मिल ही जाते हैं।


क्यों फ़िक्र रुसवाई की हो, दामन छुपा के यूँ चले,

हर शक्स को भूल जाने को अफ़साने मिल ही जाते हैं।


न छेड़ो जुगनुओं को आज रात काफी हसीन है,

हर महफ़िल रोशन करने को परवाने मिल ही जाते हैं।


ये जश्न-ए-मोहब्बत देखो, जाम ख्वाइशों के नाम,

दिल और दर्द को ‘साकी’ दवाखाने मिल ही जाते हैं।


ज़मीन से फ़लक तक , तलाश बाकी है अभी,

कब्रिस्तान में हजारों को आशियाने मिल ही जाते हैं।


तावीज़ से बंधी , मिर्ची से उडी, नज़र हटाने,

ओ अहमक पुर्जे अनजाने मिल ही जाते हैं ।


कच्चे हैं ख्वाब रेत, बहते , मिलते हैं खो जाते हैं,

ये रिश्ते नाज़ुक हैं बहुत , आज़माने मिल ही जाते हैं।


खुदा नहीं जो कहता कभी, शैतैन को नामंज़ूर हुई,

वो दास्ताँ कहने वाले सनम दीवाने मिल ही जाते हैं।


दिल धड़कता नहीं ‘मिराज’, जुबां गुम सी हो गयी कहीं,

ग़ज़ल कहते हुए फिर भी यहाँ, कारखाने मिल ही जाते हैं.

Monday, April 25, 2011

यूँ ही (२)

वो क्यों आज कलम फिर पुरानी ढूँढ़ते हैं ,

वक़्त में ठहरी हुई कोई निशानी ढूँढ़ते हैं।


पैरों से तेज़ चलते इन रास्तों में क्यों,

वो मंज़िल्लों के किस्से कहानी ढूँढ़ते हैं।


नए रंग रौनक की दुनिया से जुदा,

वो ज़ख्मों में दर्द जुबानी ढूँढ़ते हैं।


कोई ग़ज़ल, कोई कता, न रुबाई की तड़प,

वो महफ़िल यूँ रुसवा बेगानी ढूँढ़ते हैं।


गोया रोशन ही न हो ये दिन और न रात,

वो दौ-पहर में शमा अन्जानी ढूँढ़ते है।


तारीख ने जो लहू से कई आयतें लिखी,

हर लफ्ज़ में वो सिफ़र बेमानी ढूँढ़ते हैं।


मिट्टी है, यादें हैं, जो यहाँ भी वहां भी,

क्यों करबला में ही वो कुर्बानी ढूँढ़ते हैं।


साँस चलती है, दिल भी धड़कता है “मिराज"

फिर कहाँ सब बेसबब जिंदगानी ढूँढ़ते हैं।

Tuesday, February 15, 2011

सोचा ही नहीं था.

मजबूर मोहब्बत होगी खुल्द में सोचा ही नहीं था,

खुदी हम, एक बाज़ार होंगे, सोचा ही नहीं था.

हर लम्हे में तेरे, खुदी को ढूँढा क्यों हमने,

कुछ लम्हे होंगे सिर्फ तेरे, सोचा ही नहीं था.

रात खाली मिली, क्यों स्याह आफताब मिला हमें ,

जुबां खाली, इल्म स्याह होगा, सोचा ही नहीं था.

वादा तो नहीं किया था, आने का, मेरे साकी,

एक जाम मेरे नाम न होगा, सोचा ही नहीं था.

ये कैसा पहरा है चाँद पर घड़ी चलती ही नहीं,

न सहर होगी न शाम, कभी सोचा ही नहीं था.

कहते तो हैं दुनिया में सभी, किरदार हैं ‘मिराज’,

इस अफ़साने में नहीं होगा कोई, सोचा ही नहीं था.

Friday, January 21, 2011

विचार 1

कुएं में आजकल मेंडक नहीं,
मगरमच्छ दिखाई देते हैं।
कल सांझ खंडहरों के पास,
गिद्दों को कहते सुना था मैंने,
कुएं का पानी नमकीन हो रहा है।
उसका स्तर भी बढ़ रहा है।
यूँ ही नहीं विलाप की आवाज़ आती मुझे।
शायद अब कुछ दिन में,
आकाश साफ़ साफ़ नज़र आने लगे...

Friday, January 14, 2011

सवाल 1

यूँ कहा कि कुछ कहा ही नहीं, ये गुफ्तगू हुई भी तो क्या हुई,

यूँ जिए की लगा हम जिए ही नहीं, ये ज़िन्दगी हुई भी तो क्या हुई.

शब् से रूठे कंदील जहाँ हम गए, शमा जली कब जल कर बुझ गयी,

ऐसे रोशन हुए कुछ दिखा ही नहीं, ये सेहर हुई भी तो क्या हुई.

न दोस्त, न दुशमन, न रिश्ता कोई, हम हैं भी और होकर भी कुछ नहीं

मेहमाँ भी नहीं, मेजबान भी नहीं, ये महफ़िल हुई भी तो क्या हुई.

कुछ जलसे हैं मेए जिसका हिस्सा नहीं, किस नीयत से चलते हैं मालूम नहीं,

तेरे सजदे में आबरू का सौदा करें, ये इबादात हुई भी तो क्या हुई.

खौफ आँखों में है, उसकी इज्ज़त नहीं, उस्ताद है वो लेकिन आलीम नहीं,

मेरे इल्म में शामिल बसीरत नहीं, ये तालीम हुई भी तो क्या हुई.

न तुक, काफिया, न ही मकसद कोई, लफ्ज़ यूँ ही पिरोये हुए हैं कई,

कोई कैसे न पूछे तुमसे ये ‘मिराज’, ये ग़ज़ल हुई भी तो क्या हुई.

Mayfly.

Sun-kissed nights,  run wild and sure mornings, shrouded in grey walk slow,  noons burn high, and so do the hearts. like dawns I linger, lik...