Sunday, February 23, 2014

To ban or not to ban; this is not the question.

To ban or not to ban; this is not the question.


Wasn’t long back that Wendy Doniger’s book The Hindus; An Alternative History was withdrawn by The Penguin, forcing people to talk turkey. Strong opinions, exasperated comments, inflated egoistic remarks; everyone has something to dish out. The out of court settlement with the right wing lobby, high talk on religious sentiments has had all of us involved in a bull’s session. However, what is the real question? Is it, how important it was to ban her book or how the book is detrimental to our society? Is it about author’s scholarship, quality of work or the colonial hangover she might have carried, if any. One may also question the attacks on the book, the rightist attitude towards condemning anything slightly negative towards religion.
At the same time, it is also important to question ourselves? Are we as Indians being pseudo secular banning away books which are non-normative? Whether it is Satanic Verses (1988) or A.K Ramanujan’s (Three Hundred Ramayanas: Five examples and three thoughts on translation) in 2011 or The true Furqan by Al Saffee and Al Mahdee in 2005 to cite a few.
It is also important to question our modernity, for it is us, who stand united, up in arms, against Valentines Day celebration; condemn girls wearing jeans to college and resort to legitimizing Kangaroo courts in the name of preserving culture.
Also important is to question the neo liberal agenda which feeds us scraps of cultural leftovers from feasts enjoyed by right wing politics, corporate and sponsored media; leaving us to enjoy a simulated holy war against an invisible threat, deliberately constructed in our psyche.
It is also important to question the world of glittering voyeuristic pleasure we revel in. Addiction to Yo Yo honey Singh brand of songs or applauding the flamboyant display of performances replete with double entendres, sexually obscene gestures and suggestive body language. It is important to question an audience that watches its own younger generation sinking its teeth deep into voyeuristic pleasure and devouring it with delight.
We, the biggest democracy of the world, with ancient religions dating thousands of years should perhaps also question the formation of such a collective; with fragmented identities and hollow value system trapped in a state of perpetual unrest and discord within. The intoxicating celebrations of our neo-liberal world are marked by a ruthless display of ‘symbolic and cultural capital’ one has amassed; recreating and ‘reproducing’ stereotypes.
It is important to question the pervasive hypocrisy of our society rendering it susceptible to violence as is experienced by a Nirbhaya everyday or when a new Mujaffar Nagar is destroyed every once in a while.
It seems that religion is such a frail entity that any little investigation will lead to its downfall and destruction. This obsession with sanctity and a fortified conservative attitude towards the sacred is bewildering. This insecurity to preserve rectitude is confusing. Academic work of any kind, if at all ruffle some feathers; should be taken in the right spirit and religion should be able to defend itself for its believers.
Though I haven’t read the book myself like many others condemning it; I still want to defend the author’s freedom of expression as much I want to defend the religion’s inherent strength to answer back to its detractors.
It is important to question, Why are we afraid and of what?
Religions are not weak, nor are human beings foolish. If we have a society which has grown up to be able to deal with Honey Singh and the likes; the potential damage such lyrics may cause to society; an academic article can cause no harm. Should a religious entity not be able to hold fast in the wake of such dissent voices?
In fact, such a parallel discourse must exist, so as to provide a chance to the believer to rediscover the strengths of her religion and eliminate its weaknesses. Our religions are not in need of rightwing bail-outs. Wendy Doniger’s book should not be seen as an offensive limitation. 
It is time, to look within, and lift some bans off our soul than ban questions which do not have easy answers.


Thursday, September 29, 2011

गुलाब

ये कौन हैं ख्याल जो मेज़बान हो गए,
क्यों अपने ही घर में हम मेहमान हो गए.

मैं देखूँ मेरे जिस्म के बँटते हुए टुकड़े,
कब मज़ार बने कब महफ़िल कब दुकान हो गए.

ये कैसी है सलीब, उठाये हर कंधा है जिसे,
ये कब खुदा बने, कब मसीहा, कब शैतान हो गए.

ये हक इश्क का सांझा, ये प्रीत तुझसे क्यों मेरी,
अदब तेरा, हुनर तेरा, क्यों मेरे गुमान हो गए.

अभी तो रूह जलती है, अभी तो मौत बाकी है,
कि इस महफ़िल में साकी, सभी अन्जान हो गए.

मोहब्बत मेरी ‘मिराज’, राख, कच्चा कोयला,
पाक माहताब पर दाग खुदाई के निशान हो गए.

Tuesday, September 27, 2011

ताल्लुक !

इस यतीम रात को मैं कौन सा एक नाम दूँ,

क्या राख़ में लपेट कर,

इस पाक, कोरे चाँद को,

रख दूँ तेरी याद की, गिरह में कहीं.

या सुर्ख इस लहु से मैं ,

इस ख्वाब के इश्तिहार पर,

चंद लफ्ज़ तेरी गुफ्तगू के, मुज्तरिब, उकेरून कोई.

या बर्फाब तेरी आवाज़ को,

इस दिल के सहराओं में,

हर कुतबे पर कर सजदा मैं, खामोशियाँ ढूंढूं कहीं.

या लम्स कोई तेरी याद का,

क़दीम वक़्त की गिरफ्त से,

हयात कर रुखसारों पर, मैं रोशन तुझे करूँ यहीं…

तुझे नाम मैं न दूं कोई…

Thursday, August 04, 2011

एक गुफ़्तगू

खला मुक़द्दस है, और ख्वाब पाक़ सलीब मेरे मौला,

ये तजस्सुम भी क्या क़यामत के रोज़ तक्मील होगी…

वक़्त से कैसी शिकायत, कैसा शिक्वा मेरे मौला,

दर्द रवायत है, आह, इल्म में तब्दील होगी…

सर झुकाया है जरूर, घुटने टेके नहीं मौला,

मेरे किरदार का इम्तेहां क्या सिर्फ अन्जील होगी...

इस दामन के ये दाग भी हैं पाक मेरे मौला,

गुनाहों की फैरिस्त में सवाल, और जुस्तजू ज़लील होगी…

तू वाकिफ़ न हो मेरी रूह से ये मुमकिन नहीं मौला,

नशेमन की तलाश में बशारत शायद तहलील होगी…

मुम्किन है कुछ सब्र होगा मुझमें तेरा ‘मौला’

कुछ आतिश “मिराज” की तुझमें भी तख्मील होगी.

एक गुफ्तगू ...

खला मुक़द्दस है, और ख्वाब पाक़ सलीब मेरे मौला,

ये तजस्सुम भी क्या क़यामत के रोज़ तकमील होगी…

वक़्त से कैसी शिकायत, कैसा शिक्वा मेरे मौला,

दर्द रवायत है, आह, इल्म में तब्दील होगी…

सर झुकाया है जरूर, घुटने टेके नहीं मौला,

मेरे किरदार का इम्तेहाँ क्या सिर्फ अन्जील होगी...

इस दामन के ये दाग भी हैं पाक़ मेरे मौला,

गुनाहों की फैरिस्त में सवाल, और जुस्तजू ज़लील होगी…

तू वाकिफ़ न हो मेरी रूह से ये मुमकिन नहीं मौला,

नशेमन की तलाश में बशारत शायद तहलील होगी…

मुमकिन है कुछ सब्र होगा मुझमे तेरा ‘मौला’,

कुछ आतिश “मिराज” की तुझमे भी तख्मील होगी.

Tuesday, June 21, 2011

बहाने...

यूँ तो हमें मुस्कुराने के बहाने मिल ही जाते हैं,

इस शहर को भी चाहने के कुछ माने मिल ही जाते हैं।


क्यों फ़िक्र रुसवाई की हो, दामन छुपा के यूँ चले,

हर शक्स को भूल जाने को अफ़साने मिल ही जाते हैं।


न छेड़ो जुगनुओं को आज रात काफी हसीन है,

हर महफ़िल रोशन करने को परवाने मिल ही जाते हैं।


ये जश्न-ए-मोहब्बत देखो, जाम ख्वाइशों के नाम,

दिल और दर्द को ‘साकी’ दवाखाने मिल ही जाते हैं।


ज़मीन से फ़लक तक , तलाश बाकी है अभी,

कब्रिस्तान में हजारों को आशियाने मिल ही जाते हैं।


तावीज़ से बंधी , मिर्ची से उडी, नज़र हटाने,

अहमक पुर्जे अनजाने मिल ही जाते हैं ।


कच्चे हैं ख्वाब रेत, बहते , मिलते हैं खो जाते हैं,

ये रिश्ते नाज़ुक हैं बहुत , आज़माने मिल ही जाते हैं।


खुदा नहीं जो कहता कभी, शैतैन को नामंज़ूर हुई,

वो दास्ताँ कहने वाले सनम दीवाने मिल ही जाते हैं।


दिल धड़कता नहीं ‘मिराज’, जुबां गुम सी हो गयी कहीं,

ग़ज़ल कहते हुए फिर भी यहाँ, कारखाने मिल ही जाते हैं.

Monday, April 25, 2011

यूँ ही (२)

वो क्यों आज कलम फिर पुरानी ढूँढ़ते हैं ,

वक़्त में ठहरी हुई कोई निशानी ढूँढ़ते हैं।


पैरों से तेज़ चलते इन रास्तों में क्यों,

वो मंज़िल्लों के किस्से कहानी ढूँढ़ते हैं।


नए रंग रौनक की दुनिया से जुदा,

वो ज़ख्मों में दर्द जुबानी ढूँढ़ते हैं।


कोई ग़ज़ल, कोई कता, न रुबाई की तड़प,

वो महफ़िल यूँ रुसवा बेगानी ढूँढ़ते हैं।


गोया रोशन ही न हो ये दिन और न रात,

वो दौ-पहर में शमा अन्जानी ढूँढ़ते है।


तारीख ने जो लहू से कई आयतें लिखी,

हर लफ्ज़ में वो सिफ़र बेमानी ढूँढ़ते हैं।


मिट्टी है, यादें हैं, जो यहाँ भी वहां भी,

क्यों करबला में ही वो कुर्बानी ढूँढ़ते हैं।


साँस चलती है, दिल भी धड़कता है “मिराज"

फिर कहाँ सब बेसबब जिंदगानी ढूँढ़ते हैं।

concentric spirals

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