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Tuesday, May 25, 2010

Tishnagi.

वो क्यों आज कलम फिर पुरानी ढूँढ़ते है,
वक़्त में ठहेरी हुई कोई निशानी ढूँढ़ते हैं.

पैरों से तेज़ चलते इन रास्तों में यूँ क्यों
वो मंज़िल्लों के किस्से कहानी ढूँढ़ते हैं

नए रंग रौनक की दुनिया से जुदा
वो ज़ख्मो में दर्द जुबानी ढूँढ़ते हैं

कोई ग़ज़ल, कोई कता , न रुबाई की तड़प
वो महफ़िल यूँ रुसवा बेगानी ढूँढ़ते हैं

गोया रोशन ही न हो ये दिन और न रात
वो दो-पहर में शमा अनजानी ढूँढ़ते है

तारीख में जो लुहू से कई आयतें लिखी
हर लफ्ज़ में वो सिफर बेमानी ढूँढ़ते हैं.

मिटटी हैं, यादें हैं , जो यहाँ भी वहां भी
क्यों कर्बला में ही वो कुर्बानी ढूँढ़ते हैं

सांस चलती है, दिल भी धड़कता है “मिराज”
फिर कहाँ सब बेसबब जिंदगानी ढूँढ़ते हैं.

Thursday, December 10, 2009

rang-e-mehfil

नज़र नाज़ुक हैरान सर-ऐ-आम हुई है
कब सुबह हुई और कब शाम हुई है

शमा बुझ गयी परवाने जलते ही रहे
आज मय एक तनहा जाम हुई है

उम्र भर दास्ताँ कई तहों में लिखी
दो लफ़्ज़ों में ही गुफ्तगू तमाम हुई है

चाँद टपका न रात भरी आँख से सनम
लबों की ये धूप भी गुमनाम हुई है

ये मंज़र नया भी पुराना भी है
ख़ामोशी ही तूफ़ान का पैगाम हुई है

इस रंग-ऐ-महफ़िल में संभलना ए 'मिराज'
यहाँ कोरी हया भी बदनाम हुई है

Mayfly.

Sun-kissed nights,  run wild and sure mornings, shrouded in grey walk slow,  noons burn high, and so do the hearts. like dawns I linger, lik...