Tuesday, May 25, 2010

Tishnagi.

वो क्यों आज कलम फिर पुरानी ढूँढ़ते है,
वक़्त में ठहेरी हुई कोई निशानी ढूँढ़ते हैं.

पैरों से तेज़ चलते इन रास्तों में यूँ क्यों
वो मंज़िल्लों के किस्से कहानी ढूँढ़ते हैं

नए रंग रौनक की दुनिया से जुदा
वो ज़ख्मो में दर्द जुबानी ढूँढ़ते हैं

कोई ग़ज़ल, कोई कता , न रुबाई की तड़प
वो महफ़िल यूँ रुसवा बेगानी ढूँढ़ते हैं

गोया रोशन ही न हो ये दिन और न रात
वो दो-पहर में शमा अनजानी ढूँढ़ते है

तारीख में जो लुहू से कई आयतें लिखी
हर लफ्ज़ में वो सिफर बेमानी ढूँढ़ते हैं.

मिटटी हैं, यादें हैं , जो यहाँ भी वहां भी
क्यों कर्बला में ही वो कुर्बानी ढूँढ़ते हैं

सांस चलती है, दिल भी धड़कता है “मिराज”
फिर कहाँ सब बेसबब जिंदगानी ढूँढ़ते हैं.

5 comments:

Divesh said...

tishnagi ki inteha..

behtareen peshkash :)

meeta said...

beautiful, soulful, every word is filled with emotions,life is singing back through every line...awesome piece of work...Kudos...keep writing

harshitasharma said...

baarish ke mausam mein, kagaz ki nav banate hain, aur usme apna khoya hua bachpan dhundhte hain...

bahaut khoobsurat hai

Keep Writing
Regards
Harshita :)

ani_aset said...

kya baat hai...bahut achcha likha hai...superb

chandrakant said...

"tishnagi" this word fascinates me.Great composition.I really liked .it.Plz keep the good work ON.

concentric spirals

Related Posts Widget for Blogs by LinkWithin