Thursday, May 06, 2010

नींद टूट जाये 'मिराज' क्या सेहर लाये हो

नींद टूट जाये 'मिराज' क्या सहर लाये हो,
इस शब् में आफ़ताब क्या कहर लाये हो

फलक से कुछ दूर की ख़ामोशी चूम कर
आवाजों की ये कौन सी दोपहर लाये हो

कलम बेआबरू होती है ऐसे भी मंज़र हैं,
इस नुमाइश में ये कौन सा शहर लाये हो

दरिया से कर के बैर माझी तड़पता ही रहा
यादों के ज़लज़ले में कैसी लहर लाये हो

पानी है या कि मय है, नशा चढ़ता ही नहीं
आज जाम लाये हो या फिर ज़हर लाये हो

बंद गांठो में ही ग़ालिब नज़्म बंधी रह गयी
ये कैसी तबाही छोड़ तुम शहर आये हो

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I am Sorry!

Koi kissa kahani nahi kehna chahti, Roohein roz bikti hain yahan, Aur humne outraged ho kar khoob dekhein hain tamashe yun hi. Mai...