Tuesday, September 27, 2011

ताल्लुक !

इस यतीम रात को मैं कौन सा एक नाम दूँ,

क्या राख़ में लपेट कर,

इस पाक, कोरे चाँद को,

रख दूँ तेरी याद की, गिरह में कहीं.

या सुर्ख इस लहु से मैं ,

इस ख्वाब के इश्तिहार पर,

चंद लफ्ज़ तेरी गुफ्तगू के, मुज्तरिब, उकेरून कोई.

या बर्फाब तेरी आवाज़ को,

इस दिल के सहराओं में,

हर कुतबे पर कर सजदा मैं, खामोशियाँ ढूंढूं कहीं.

या लम्स कोई तेरी याद का,

क़दीम वक़्त की गिरफ्त से,

हयात कर रुखसारों पर, मैं रोशन तुझे करूँ यहीं…

तुझे नाम मैं न दूं कोई…

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